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Importance of Shree Krishan Gowerdhan Jii Parikarma , श्री कृष्णा जी की परिक्रमा का परिक्रमा का महत्व

गोवेर्धन जी की सप्तकोसी परिक्रमा 


सप्तकोसी  परिक्रमा
सप्तकोसी  परिक्रमा 

गोवेर्धन परिक्रमा मार्ग , उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले से 22 किलो मीटर दूरी पर स्थित है 

प्रत्येक मास के शुक्ल पक्ष कि एकादशी से पूर्णिमा तक लाखो भक्त यहाँ आते है और गिर्राज जी की सप्तकोसी परिक्रमा को पूर्ण करते है 

वर्ष में  गुरु पूर्णिमा( मुड़िया पूर्णो ) को यहाँ मेला आयोजित होता है जिसमे दूर दूर से भक्त आते है 
और इस दिन राज्य सरकार द्वारा सुरक्षा कडी कर दी जाती है जिससे परिक्रमा सुलभ बन सके 
2019 में गुरु पूर्णिमा 16 जुलाई की है


बड़ी परिक्रमा  ( 7 कोस )  


प्रारंभिक  परिक्रमा
प्रारंभिक  परिक्रमा 
श्री गिरिराज जी की सम्पूर्ण परिक्रमा सात कोस (21 किमी) की है। कोई भी भक्त अपनी सुविधा अनुसार गोवर्धन परिक्रमा को दो भागो में विभाजित कर दो दिन में लगाते है। इन दोनों परिक्रमा को छोटी व बड़ी परिक्रमा के नाम से जाना जाता है। परिक्रमा के मध्य में गोवर्धन गाँव पड़ता है। इसके उत्तर दिशा मे राधाकुण्ड गाँव एवं दक्षिण दिशा में पुछरी गाँव स्थित है।


छोटी परिक्रमा  ( 3 कोस )


छोटी परिक्रमा
छोटी परिक्रमा 

गोवर्धन दानघाटी से आन्यौर, पुछरी, जतिपुरा होते हुए पुनः गोवर्धन आने की परिक्रमा बड़ी परिक्रमा कहलाती है। जो की चार कोस (12 किमी) की होती है। गोवर्धन से उद्धव कुण्ड होते हुए। राधाकुण्ड फिर यहाँ से पुनः वापस गोवर्धन आने वाली परिक्रमा, छोटी परिक्रमा कहलाती है। यह परिक्रमा 3 कोस (6 किमी) में सम्पन्न होती है।


 परिक्रमा भक्त लोग अपनी इच्छा अनुसार देते है। इनमें से सम्पूण परिक्रमा (सात कोस) एक ही दिन में समाप्त करना अच्छा है। सात कोसी गिर्राज परिक्रमा में बहुत सी छोटी-छोटी परिक्रमाये है। जैसे मानसी गंगा, राधा कुण्ड, गोविन्द कुण्ड आदि। 

कुछ भक्तों की श्रद्वा इतनी है की वे साष्टाङ्ग दंडवत ( लेटते - लेटते ) दंडवत परिक्रमा देते है। 
जिसमे लगभग २- 4 सप्ताह का समय लगता है ........
Dandwarti Parikarma
दंडवर्ती परिक्रमा 


श्री कृष्णा जी की परिक्रमा का महत्व
इस पर्वत की परिक्रमा का लोगों में महत्व है। वल्लभ सम्प्रदाय के वैष्णवमार्गी लोग तो इसकी परिक्रमा अवश्य ही करते हैं क्योंकि वल्लभ संप्रदाय में भगवान कृष्ण के उस स्वरूप की आराधना की जाती है जिसमें उन्होंने बाएं हाथ से गोवर्धन पर्वत उठा रखा है और उनका दायां हाथ कमर पर है। इस पर्वत की परिक्रमा के लिए समूचे विश्व से कृष्णभक्त, वैष्णवजन और वल्लभ संप्रदाय के लोग आते हैं। 

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